छठ पूजा 2026: आस्था, सूर्य उपासना और लोक संस्कृति का अद्भुत महापर्व
भारत की सांस्कृतिक विरासत में कुछ ऐसे पर्व हैं जो केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि लोगों की भावनाओं, विश्वास और परंपराओं का जीवंत प्रतीक बन चुके हैं। छठ पूजा ऐसा ही एक महान पर्व है, जो श्रद्धा, तपस्या और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है। जब कार्तिक माह में दीपावली की रोशनी धीरे-धीरे फीकी पड़ने लगती है, तब घाटों पर जलते दीपक, लोकगीतों की मधुर धुन और डूबते एवं उगते सूर्य को अर्घ्य देने वाले श्रद्धालुओं का दृश्य एक अलग ही आध्यात्मिक वातावरण बना देता है।
छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के मधेश क्षेत्र में मनाया जाता है, लेकिन आज यह पर्व देश और दुनिया के कई हिस्सों तक पहुंच चुका है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, काठमांडू और जनकपुर जैसे शहरों से लेकर अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और ब्रिटेन तक भारतीय और नेपाली समुदाय पूरे उत्साह के साथ इस पर्व को मनाते हैं।
छठ पूजा का महत्व
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया की आराधना का पर्व है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार सूर्य जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य के सबसे बड़े स्रोत हैं। इसलिए इस दिन सूर्य देव को धन्यवाद दिया जाता है और परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य तथा संतान की लंबी आयु की कामना की जाती है।
छठी मैया को प्रकृति का छठा स्वरूप माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि उनकी कृपा से परिवार में खुशहाली आती है और बच्चों को रोगों एवं संकटों से सुरक्षा मिलती है।
छठ पूजा कब मनाई जाती है?
छठ पूजा वर्ष में दो बार मनाई जाती है। पहली बार चैत्र माह में, जिसे चैती छठ कहा जाता है, जबकि दूसरी और अधिक लोकप्रिय छठ पूजा कार्तिक माह में दीपावली के छह दिन बाद मनाई जाती है। कार्तिक छठ का महत्व सबसे अधिक माना जाता है और इसी अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं।
चार दिनों तक चलने वाला कठिन व्रत
छठ पूजा चार दिनों तक चलने वाला अत्यंत कठिन और अनुशासित व्रत है। इस दौरान श्रद्धालु शुद्धता, संयम और भक्ति का विशेष ध्यान रखते हैं।
पहला दिन: नहाय-खाय
छठ पूजा की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती पवित्र स्नान करते हैं और पूरे घर की साफ-सफाई की जाती है। इसके बाद लौकी, चने की दाल और चावल से बना सात्विक भोजन भगवान को अर्पित किया जाता है। यही भोजन व्रती ग्रहण करते हैं और इसके साथ ही छठ महापर्व का शुभारंभ होता है।
दूसरा दिन: खरना
दूसरे दिन को खरना या लोहंडा कहा जाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला उपवास रखते हैं। शाम को पूजा के बाद गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाता है, जो छठ पूजा की सबसे कठिन तपस्याओं में से एक माना जाता है।

तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य
तीसरे दिन घरों में प्रसाद तैयार किया जाता है। श्रद्धालु बांस की टोकरी में फल, नारियल, गन्ना, ठेकुआ और अन्य प्रसाद सजाते हैं। शाम के समय परिवार के सभी सदस्य नदी, तालाब या घाट पर पहुंचते हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। इस समय घाटों पर हजारों दीपकों की रोशनी, छठ गीतों की मधुर धुन और श्रद्धालुओं की भक्ति देखने योग्य होती है। यह दृश्य हर किसी को आध्यात्मिक अनुभूति कराता है।

चौथा दिन: उषा अर्घ्य
छठ पूजा के अंतिम दिन सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। मान्यता है कि उगते सूर्य की पूजा से नई ऊर्जा, स्वास्थ्य और सफलता प्राप्त होती है। अर्घ्य देने के बाद व्रती प्रसाद और जल ग्रहण कर अपना व्रत समाप्त करते हैं, जिसे पारण कहा जाता है।

छठ पूजा के विशेष प्रसाद
छठ पूजा के प्रसाद का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बहुत अधिक है। सभी प्रसाद पूरी तरह सात्विक होते हैं और बिना लहसुन-प्याज के बनाए जाते हैं।
ठेकुआ छठ पूजा का सबसे प्रसिद्ध प्रसाद माना जाता है। गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बने इस प्रसाद का स्वाद और महत्व दोनों ही विशेष होते हैं। इसके अलावा कसार, रसियाव, चावल के लड्डू, नारियल, केला, मौसमी फल और गन्ना भी पूजा में अर्पित किए जाते हैं।
इन प्रसादों में केवल स्वाद ही नहीं बल्कि श्रद्धा, परंपरा और परिवार की भावनाएं भी जुड़ी होती हैं।

छठ पूजा से जुड़ी पौराणिक कथाएं
छठ पूजा का उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों में मिलता है। मान्यता है कि वनवास से लौटने के बाद भगवान राम और माता सीता ने सूर्य देव की पूजा की थी। इसी पूजा के प्रभाव से उन्हें संतान सुख का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
महाभारत में भी छठ पूजा का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि माता कुंती और सूर्यपुत्र कर्ण सूर्य उपासना करते थे। कर्ण प्रतिदिन जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित करते थे। उनकी इसी भक्ति के कारण उन्हें महान योद्धा बनने का वरदान प्राप्त हुआ।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है छठ
छठ पूजा को सबसे पर्यावरण अनुकूल त्योहारों में से एक माना जाता है। इस पर्व में मिट्टी के दीपक, बांस की टोकरियां और प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है। पूजा में प्लास्टिक या कृत्रिम वस्तुओं का प्रयोग बहुत कम होता है।
इसके अलावा छठ से पहले नदी, तालाब और घाटों की सफाई की परंपरा भी लोगों को स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक बनाती है।
लोक आस्था और संस्कृति का संगम
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि यह लोक संस्कृति, सामाजिक एकता और पारिवारिक प्रेम का उत्सव भी है। इस पर्व में समाज के सभी लोग मिलकर घाटों की तैयारी करते हैं और एक-दूसरे की सहायता करते हैं। यही कारण है कि छठ पूजा को लोक आस्था का महापर्व कहा जाता है।
आज भले ही लोग दुनिया के किसी भी कोने में रहते हों, लेकिन छठ पूजा उन्हें अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़कर रखती है। सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता, परिवार की खुशहाली की कामना और प्रकृति के सम्मान का संदेश देने वाला यह पर्व भारतीय संस्कृति की अनमोल धरोहर है।
Disclaimer:
यह लेख विभिन्न धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और सांस्कृतिक परंपराओं पर आधारित है। छठ पूजा से जुड़ी कथाएं और विश्वास अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं। लेख का उद्देश्य केवल जानकारी प्रदान करना है, किसी धार्मिक मान्यता की पुष्टि या खंडन करना नहीं।
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