JPSC-JSSC Vivad: :रांची में इन दिनों सिर्फ बारिश ही नहीं हो रही, बल्कि हजारों युवाओं के मन में सालों से जमा गुस्सा भी बाहर निकल रहा है। सरकारी नौकरी की उम्मीद लेकर परीक्षा देने वाले छात्रों का कहना है कि अगर भर्ती प्रक्रिया पर ही भरोसा नहीं रहेगा, तो उनकी मेहनत और भविष्य का क्या होगा? इसी सवाल को लेकर रांची के जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में छात्रों का आंदोलन लगातार जारी है।
मामला 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा में कथित गड़बड़ियों से शुरू हुआ था, लेकिन अब इसकी आवाज सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। छात्र 2019 से 2026 के बीच JPSC और JSSC की कई विवादित भर्तियों की जांच की मांग कर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी मांग है कि इन मामलों की जांच राज्य की एजेंसी के बजाय केंद्रीय जांच एजेंसी यानी CBI से कराई जाए।
14वीं JPSC परीक्षा से कैसे भड़का विवाद?
14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा को लेकर उस समय सवाल खड़े हुए जब कुछ परीक्षा केंद्रों पर प्रश्नपत्र के लिफाफे खुले मिलने और OMR शीट से जुड़ी अनियमितताओं के आरोप सामने आए। इसके बाद छात्रों का आक्रोश धीरे-धीरे आंदोलन में बदल गया।
छात्रों का आरोप है कि परीक्षा जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अगर प्रश्नपत्र और OMR शीट की सुरक्षा पर सवाल खड़े हों, तो केवल कुछ लोगों पर कार्रवाई कर मामला खत्म नहीं किया जा सकता। उन्हें पूरे सिस्टम की निष्पक्ष जांच चाहिए।
राज्य सरकार की ओर से मामले की जांच CID को सौंपी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में 19 से ज्यादा गिरफ्तारियां भी हुई हैं। इनमें परीक्षा केंद्रों से जुड़े लोग, बिचौलिए और अन्य संदिग्ध शामिल बताए गए हैं। इसके बावजूद आंदोलनकारी छात्र CBI जांच की मांग पर कायम हैं।
छात्रों की नाराजगी सिर्फ एक परीक्षा को लेकर नहीं
इस आंदोलन को समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों के विवादों को देखना जरूरी है। छात्रों का कहना है कि JPSC और JSSC की भर्ती परीक्षाओं को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं और हर बार अभ्यर्थियों के भरोसे को चोट पहुंची है।
2019-20 के दौरान JPSC के परिणाम, कटऑफ और मेरिट सूची को लेकर विवाद सामने आया था। इसके बाद 2021 में JPSC संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा की उत्तर कुंजी और चयन प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे। 2022 में JSSC की कुछ भर्तियों में कटऑफ और मूल्यांकन व्यवस्था पर छात्रों ने आपत्ति जताई।
2023 में JSSC CGL परीक्षा को लेकर पेपर लीक के आरोपों ने माहौल गर्म कर दिया। 2024 में JGGLCCE/JSSC CGL से जुड़ी कथित गड़बड़ियों और डमी अभ्यर्थियों को लेकर भी मामला चर्चा में रहा। 2025 में कुछ अन्य JSSC भर्तियों के रिजल्ट में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए गए। अब 2026 में 14वीं JPSC PT परीक्षा विवाद ने आंदोलन को एक बड़े स्तर पर पहुंचा दिया है।
यही वजह है कि छात्र इसे सिर्फ एक परीक्षा की समस्या नहीं मान रहे हैं। उनके लिए यह पिछले कई वर्षों से बनते जा रहे अविश्वास का परिणाम है।
आखिर CBI जांच की मांग क्यों कर रहे हैं छात्र?
यह सवाल इस पूरे आंदोलन का सबसे अहम हिस्सा है। राज्य सरकार का कहना है कि CID मामले की जांच कर रही है और कार्रवाई भी हुई है। लेकिन आंदोलनकारी छात्रों का भरोसा राज्य की जांच एजेंसी पर पूरी तरह कायम नहीं है।
छात्रों का आरोप है कि जांच में छोटे स्तर पर शामिल लोगों तक कार्रवाई सीमित रह सकती है, जबकि कथित बड़े नेटवर्क तक पहुंचना जरूरी है। उनका दावा है कि भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी का नेटवर्क अगर दूसरे राज्यों तक फैला है, तो इसकी व्यापक जांच केंद्रीय एजेंसी के जरिए होनी चाहिए।
हालांकि इन आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। किसी भी व्यक्ति या संस्था की भूमिका तय करने के लिए जांच और कानूनी प्रक्रिया का पूरा होना जरूरी है। लेकिन छात्रों की CBI जांच की मांग यह जरूर दिखाती है कि उनके भीतर राज्य की मौजूदा जांच व्यवस्था को लेकर गहरा अविश्वास पैदा हो चुका है।

‘अभय तिवारी’ नाम क्यों बन गया आंदोलन का प्रतीक?
इस आंदोलन के दौरान ‘अभय तिवारी’ नाम भी बार-बार सुनाई दे रहा है। छात्रों के आरोपों में यह नाम कथित भर्ती सिंडिकेट और परीक्षा व्यवस्था में अनियमितताओं के प्रतीक के तौर पर सामने आया है।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि कुछ लोगों को परीक्षा प्रक्रिया में अनुचित लाभ मिलने की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसी संदर्भ में OMR शीट, परीक्षा में अनुपस्थिति और मेरिट में जगह बनाने जैसे गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं।
लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि किसी व्यक्ति पर लगाए गए आरोप और अदालत या सक्षम जांच एजेंसी द्वारा साबित किए गए तथ्य अलग-अलग चीजें हैं। इसलिए ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच ही यह स्पष्ट कर सकती है कि वास्तव में क्या हुआ और कौन जिम्मेदार है।
सरकार ने बनाई हाई-लेवल कमेटी, फिर भी नहीं माने छात्र
लगातार चल रहे आंदोलन के बीच सरकार ने बातचीत की कोशिश तेज की है। रिपोर्ट के मुताबिक चार मंत्रियों और एक वरिष्ठ IAS अधिकारी को शामिल करते हुए हाई-लेवल कमेटी बनाई गई है। सरकार की ओर से छात्रों से बातचीत का प्रस्ताव भी रखा गया है।
लेकिन आंदोलनकारी छात्र सिर्फ आश्वासन से संतुष्ट होते नजर नहीं आ रहे। उनका कहना है कि उन्हें ऐसी जांच चाहिए जिस पर सभी अभ्यर्थियों को भरोसा हो। छात्रों ने यह भी स्पष्ट किया है कि वे बंद कमरे में होने वाली बैठकों के बजाय खुले मंच पर बातचीत चाहते हैं।
यह मांग बताती है कि विवाद अब सिर्फ परीक्षा की प्रक्रिया से जुड़ा नहीं है। यह सरकार, भर्ती संस्थाओं और जांच व्यवस्था के प्रति युवाओं के भरोसे का सवाल बन चुका है।
JPSC-JSSC Vivad: क्या आंदोलन जांच एजेंसी के खिलाफ है?
अगर पूरे मामले को ध्यान से देखा जाए तो छात्रों का आंदोलन सीधे तौर पर किसी जांच एजेंसी को निशाना बनाने से ज्यादा निष्पक्ष और भरोसेमंद जांच की मांग करता दिखाई देता है।
छात्रों का तर्क है कि जब आरोप कई वर्षों और कई भर्ती परीक्षाओं तक फैले हों, तो जांच ऐसी एजेंसी से होनी चाहिए जिस पर राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव का संदेह न रहे। इसी कारण वे CBI को बेहतर विकल्प मान रहे हैं।
दूसरी तरफ राज्य सरकार का कहना है कि CID जांच कर रही है और कार्रवाई भी हो रही है। इसलिए असली सवाल यह है कि क्या मौजूदा जांच छात्रों का भरोसा जीत पाएगी या फिर CBI जांच की मांग और मजबूत होगी?
युवाओं के लिए यह सिर्फ नौकरी का सवाल नहीं
सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाला एक युवा कई साल अपनी पढ़ाई, कोचिंग, किताबों और परीक्षाओं में लगा देता है। कई उम्मीदवारों के लिए एक परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती, बल्कि परिवार की उम्मीद और अपने भविष्य का रास्ता होती है।
ऐसे में जब पेपर लीक, OMR, फर्जी अभ्यर्थी या चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी जैसे आरोप सामने आते हैं, तो इसका असर सिर्फ परीक्षा देने वाले कुछ हजार छात्रों तक सीमित नहीं रहता। इससे पूरी भर्ती व्यवस्था पर विश्वास कमजोर होता है।
रांची में चल रहा आंदोलन इसी टूटते भरोसे की तस्वीर पेश कर रहा है। छात्र चाहते हैं कि सरकार सिर्फ दोषियों को पकड़ने तक सीमित न रहे, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाए जिसमें भविष्य में किसी अभ्यर्थी को अपनी मेहनत के साथ धोखा होने का डर न रहे।
Disclaimer:
इस लेख में शामिल आरोप, दावे और विवाद संबंधित रिपोर्टों तथा आंदोलनकारी छात्रों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर आधारित हैं। किसी व्यक्ति, संस्था या एजेंसी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को न्यायालय या सक्षम जांच एजेंसी द्वारा अंतिम रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। मामले की वास्तविक स्थिति जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।





