Rachi पहुंचे छात्र ने कहा- अब ये सवाल दिल में चुभता है| किसी छोटे से कमरे में घंटों किताबों के बीच बैठकर पढ़ना आसान नहीं होता। खासकर तब, जब घर से दूर रहकर हर महीने के खर्च का हिसाब लगाना पड़े और सामने सिर्फ एक ही सवाल हो—नौकरी आखिर कब मिलेगी? लातेहार के किसान परिवार से आने वाले जाहिद की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। सरकारी नौकरी की उम्मीद में उन्होंने कई साल पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा दिए, लेकिन नौकरी अब भी दूर है।
रांची में रहकर JSSC CGL जैसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे जाहिद के लिए यह संघर्ष केवल किताबों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं है। आर्थिक तंगी, परिवार की उम्मीदें और रिश्तेदारों के सवाल अब उनकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। वे कहते हैं कि पहले ‘कब नौकरी लगेगी?’ सवाल सुनकर उम्मीद रहती थी कि जल्द जवाब मिलेगा, लेकिन अब यही सवाल उन्हें अंदर तक परेशान करता है।
Rachi आठ साल की मेहनत और इंतजार की लंबी कहानी
जाहिद का कहना है कि सरकारी नौकरी की तैयारी करते हुए उनकी जिंदगी के करीब आठ साल निकल गए। इन वर्षों में उन्होंने लगातार पढ़ाई की, परीक्षाओं की तैयारी की और बेहतर अवसर का इंतजार किया। हर नई भर्ती उनके लिए एक नई उम्मीद लेकर आती है। लेकिन परीक्षा प्रक्रिया में देरी या विवाद सामने आने पर वही उम्मीद फिर टूटने लगती है।
उनके लिए प्रतियोगी परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं है। यह उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने का सपना है। किसान परिवार से आने वाले जाहिद जानते हैं कि सरकारी नौकरी मिलने के बाद घर की जिम्मेदारियों को संभालना आसान हो सकता है। यही उम्मीद उन्हें बार-बार किताबों के सामने बैठने की ताकत देती है।

छोटे कमरे में बड़ी उम्मीद लेकर रह रहे हैं
रांची में जाहिद जिस छोटे कमरे में रहते हैं, वही उनका घर भी है और पढ़ाई की जगह भी। कमरे में सीमित सुविधाएं हैं, लेकिन किताबों और नोट्स के बीच उनका सपना काफी बड़ा है। देर रात तक जलती टेबल लैंप की रोशनी में वह अपने भविष्य की तस्वीर तलाशते हैं।
बाहर से देखने पर यह सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी लग सकती है, लेकिन जाहिद के लिए इसके पीछे वर्षों की मेहनत और परिवार की उम्मीदें जुड़ी हैं। हर दिन वह खुद को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि अगली परीक्षा शायद उनके जीवन को बदल देगी।
जेब में तंगी, फिर भी पढ़ाई नहीं छोड़ी
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के दौरान सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक आर्थिक दबाव भी है। किराया, खाना, किताबें और दूसरी जरूरतों का खर्च सीमित पैसों में निकालना पड़ता है। जाहिद बताते हैं कि वह बहुत कम खर्च में अपना गुजारा चलाने की कोशिश करते हैं, ताकि पढ़ाई जारी रख सकें।
घर से मिलने वाली आर्थिक मदद भी सीमित है। किसान परिवार के लिए लंबे समय तक किसी बच्चे का खर्च उठाना आसान नहीं होता। ऐसे में जाहिद के सामने दो रास्ते दिखाई देते हैं—या तो पढ़ाई छोड़कर काम शुरू करें या फिर तमाम मुश्किलों के बावजूद नौकरी की तैयारी जारी रखें। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना।
‘अगर सिर्फ पढ़ते रहें और सिस्टम ही साथ न दे तो?’
जाहिद की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ अपनी नौकरी को लेकर नहीं है। वह परीक्षा व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाते हैं। उनका कहना है कि अगर युवा सालों तक मेहनत करते रहें, लेकिन भर्ती प्रक्रिया समय पर और पारदर्शी तरीके से आगे न बढ़े, तो उनकी मेहनत का क्या होगा?
यही सवाल आज कई प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के मन में भी दिखाई देता है। उम्र बढ़ती जाती है, आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है और परिवार की उम्मीदें भी बढ़ती रहती हैं। ऐसे में परीक्षा में देरी या प्रक्रिया को लेकर विवाद युवाओं के लिए सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाता, बल्कि उनके भविष्य से जुड़ा सवाल बन जाता है।
रिश्तेदारों का सवाल अब ताने जैसा लगता है
जाहिद के दर्द का एक हिस्सा उन सवालों में भी छिपा है, जो उन्हें परिवार और रिश्तेदारों से सुनने पड़ते हैं। ‘इतने साल से पढ़ रहे हो, अभी तक नौकरी नहीं लगी?’ सुनने में यह सामान्य सवाल लग सकता है, लेकिन सालों से संघर्ष कर रहे किसी युवा के लिए यह सवाल बहुत भारी हो सकता है।
हर बार इसका जवाब देना आसान नहीं होता। सामने वाले को शायद सिर्फ नौकरी का परिणाम दिखाई देता है, लेकिन उस परिणाम के पीछे की रातें, आर्थिक परेशानियां, असफल परीक्षाएं और टूटती उम्मीदें दिखाई नहीं देतीं। जाहिद की कहानी इसी अनदेखे संघर्ष की तस्वीर सामने रखती है।
जाहिद की लड़ाई सिर्फ नौकरी के लिए नहीं
रांची की सड़कों पर अपनी आवाज उठाते जाहिद जैसे युवाओं की लड़ाई केवल एक सरकारी नौकरी पाने तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि भर्ती प्रक्रिया समय पर हो, परीक्षाएं निष्पक्ष हों और वर्षों तक तैयारी करने वाले युवाओं को अपनी मेहनत का उचित अवसर मिले।
जाहिद का संघर्ष उन हजारों छात्रों की कहानी भी है जो छोटे शहरों और साधारण परिवारों से निकलकर सरकारी नौकरी का सपना देखते हैं। उनके पास बड़े संसाधन नहीं हैं, लेकिन उम्मीद अब भी बाकी है। शायद इसी उम्मीद के सहारे वह आज भी अपनी किताबें खोलते हैं और खुद से कहते हैं कि इतनी मेहनत बेकार नहीं जाएगी।
Disclaimer:
यह लेख उपलब्ध जानकारी और दिए गए विवरण के आधार पर तैयार किया गया है। इसमें व्यक्त व्यक्तिगत अनुभव और विचार संबंधित व्यक्ति के बताए गए कथनों पर आधारित हैं। परीक्षा, भर्ती प्रक्रिया या सरकारी नौकरी से जुड़े किसी भी निर्णय के लिए संबंधित विभाग की आधिकारिक जानकारी को ही अंतिम आधार मानें।





