Mirzapur The Movie Review: अगर आपने कभी मिर्जापुर की दुनिया में कदम रखा है, तो कालीन भैया का नाम आपके लिए सिर्फ एक किरदार नहीं है। वह उस पूरी कहानी का ऐसा चेहरा हैं, जिसकी मौजूदगी से माहौल अपने आप बदल जाता है। तीसरे सीजन में उनकी कम मौजूदगी ने जिस तरह दर्शकों को निराश किया था, उसके बाद अब Mirzapur The Movie में पंकज त्रिपाठी की वापसी उम्मीद जगाती है।
फिल्म को देखने के बाद यह महसूस होता है कि मेकर्स ने इस बार उस पुराने अंदाज को वापस लाने की कोशिश की है, जिसने कभी मिर्जापुर को दर्शकों के बीच इतना लोकप्रिय बनाया था। कहानी में पुरानी दुश्मनी, सत्ता की भूख, बदला, परिवार और गद्दी की लड़ाई पहले की तरह मौजूद है। हालांकि फिल्म की लंबाई कुछ जगहों पर भारी पड़ती है, लेकिन इसके बावजूद कई तेज-तर्रार हिस्से और दिलचस्प मोड़ इसे मनोरंजक बनाए रखते हैं।
कालीन भैया की वापसी बनी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
Mirzapur The Movie की सबसे बड़ी खासियत पंकज त्रिपाठी हैं। कालीन भैया के किरदार में उनकी वापसी कहानी को वह वजन देती है, जिसकी कमी पिछली कहानी में महसूस हुई थी। उनका शांत चेहरा, बातचीत का अंदाज और बिना ज्यादा शोर किए सामने वाले पर दबाव बनाने की कला अब भी असर छोड़ती है।
कालीन भैया का किरदार हमेशा से मिर्जापुर की दुनिया की सबसे मजबूत कड़ियों में रहा है। फिल्म में उनकी मौजूदगी यह याद दिलाती है कि इस कहानी का असली आकर्षण सिर्फ गोलियों और गालियों में नहीं, बल्कि किरदारों के बीच चलने वाले सत्ता के खेल में भी है।
मिर्जापुर की गद्दी के लिए फिर शुरू होती है जंग
फिल्म की कहानी एक बार फिर मिर्जापुर की गद्दी और उस पर कब्जे की लड़ाई के इर्द-गिर्द घूमती है। पुराने किरदार अपने-अपने मकसद के साथ वापस आते हैं और इसी बीच नए चेहरे कहानी को एक अलग दिशा देने की कोशिश करते हैं।
मुन्ना के रूप में दिव्येंदु की वापसी भी फिल्म में पुरानी ऊर्जा लेकर आती है। उसका किरदार अब भी अपने पिता की नजरों में खुद को साबित करने की कोशिश करता दिखाई देता है। वहीं अली फजल का गुड्डू अपने अंदाज और ताकत के साथ कहानी में मौजूद है।
इन पुराने किरदारों के बीच रवि किशन का बाब्बन यादव कहानी में एक नया रंग जोड़ता है। उसका किरदार सत्ता और महत्वाकांक्षा से भरा हुआ है और मिर्जापुर की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है। रवि किशन इस भूमिका में अपनी खास स्क्रीन प्रेजेंस लेकर आते हैं।

197 मिनट की लंबाई कहीं-कहीं खलती है
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी लंबाई कही जा सकती है। करीब 197 मिनट की यह फिल्म काफी लंबी है और कुछ हिस्सों में कहानी अपनी गति खोती हुई महसूस होती है।
कुछ दृश्यों को छोटा किया जाता तो कहानी और ज्यादा प्रभावी हो सकती थी। कई जगह ऐसा लगता है कि फिल्म तेजी से आगे बढ़ना चाहती है, लेकिन फिर अचानक किसी ऐसे हिस्से में रुक जाती है जिसकी जरूरत कम महसूस होती है। इसके बावजूद फिल्म पूरी तरह बोझिल नहीं बनती। कहानी में लगातार ऐसे मोड़ आते रहते हैं जो दर्शक की दिलचस्पी बनाए रखते हैं। खासकर जब मुख्य किरदार आमने-सामने आते हैं, तब फिल्म की गति दोबारा पकड़ में आ जाती है।
गालियां और पुराना अंदाज हुआ थोड़ा कम
मिर्जापुर की पहचान उसके बेबाक और बेहद कच्चे अंदाज से भी रही है। लेकिन फिल्म में इस चीज को कुछ हद तक नियंत्रित किया गया है। शायद लंबे समय से चल रही फ्रेंचाइजी को देखते हुए दर्शकों की थकान को ध्यान में रखकर मेकर्स ने कुछ बदलाव किए हैं।
फिर भी फिल्म पूरी तरह अपनी पुरानी पहचान से दूर नहीं जाती। जहां जरूरत होती है, वहां मिर्जापुर वाला माहौल दिखाई देता है। यही संतुलन फिल्म को उसके मूल दर्शकों से जोड़कर रखता है।
महिलाओं को इस बार भी कम जगह मिली
मिर्जापुर की कहानी में महिला किरदार हमेशा मौजूद रहे हैं, लेकिन फिल्म में उनका प्रभाव पुरुष किरदारों की तुलना में सीमित दिखाई देता है।
श्वेता त्रिपाठी की गोलू और श्रिया पिलगांवकर की स्वीटी जैसे किरदारों की कहानी पहले की तुलना में अलग मोड़ लेती है। गोलू के किरदार को जिस तरह पहले एक सख्त और हथियार उठाने वाली महिला डॉन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा था, फिल्म उस दिशा को ज्यादा आगे नहीं ले जाती।
वहीं हरशिता गौर की डिंपी को भी कहानी में ज्यादा जगह नहीं मिलती। सोनल चौहान का मुमताज बीबी वाला किरदार अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देता है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ने वाली महिला कलाकारों में शीबा चड्ढा का नाम सामने आता है। वह गुड्डू और बबलू की मां के किरदार में अपने संवाद और अंदाज से दर्शकों का ध्यान खींचती हैं।
जितेंद्र कुमार ने बबलू की जगह कितनी संभाली?
बबलू के किरदार में जितेंद्र कुमार की एंट्री फिल्म के लिए एक बड़ा बदलाव है। पहले इस भूमिका में विक्रांत मैसी नजर आए थे, इसलिए शुरुआत में दर्शकों को नए चेहरे के साथ तालमेल बैठाने में थोड़ा समय लग सकता है।
जितेंद्र कुमार को देखकर उनके पुराने लोकप्रिय किरदारों की याद आना स्वाभाविक है, लेकिन यहां वह अलग अंदाज में दिखाई देने की कोशिश करते हैं। बंदूक और एक्शन वाले हिस्सों में उन्हें अभी थोड़ा और स्वाभाविक होने की गुंजाइश दिखाई देती है।
फिर भी वह धीरे-धीरे किरदार की लय पकड़ लेते हैं और कहानी के साथ आगे बढ़ते हैं।

अली फजल और दिव्येंदु अब भी मजबूत
अगर फिल्म के पुराने चेहरों की बात करें तो अली फजल और दिव्येंदु अब भी दर्शकों को निराश नहीं करते। गुड्डू के किरदार में अली फजल ने एक ऐसा व्यक्तित्व बनाया है, जिसमें बाहरी ताकत और अंदर की संवेदनशीलता दोनों दिखाई देती हैं।
दिव्येंदु का मुन्ना भैया वाला अंदाज भी फिल्म के मनोरंजन का अहम हिस्सा है। उनके किरदार में वह बेफिक्री और आत्मविश्वास अब भी नजर आता है, जो मिर्जापुर की दुनिया में उन्हें बाकी किरदारों से अलग बनाता है। इन दोनों के साथ पंकज त्रिपाठी की मौजूदगी फिल्म की पुरानी तिकड़ी वाली ऊर्जा को काफी हद तक वापस ले आती है।
रसिका दुग्गल को मिला सबसे दिलचस्प स्पेस
रसिका दुग्गल का बीना त्रिपाठी वाला किरदार मिर्जापुर की सबसे दिलचस्प महिला भूमिकाओं में से एक रहा है। फिल्म में भी उनका किरदार सत्ता, रिश्तों और निजी संघर्ष के बीच उलझा हुआ दिखाई देता है। बीना का सफर हमेशा सीधा नहीं रहा और यही बात उसे बाकी किरदारों से अलग बनाती है। रसिका दुग्गल अपने अभिनय से किरदार की जटिलता को अच्छी तरह संभालती हैं।
फिल्म देखने के बाद यह सवाल जरूर उठता है कि क्या बीना त्रिपाठी की कहानी पर अलग से कोई स्पिन-ऑफ बनाया जा सकता है। इस किरदार में इतनी संभावनाएं हैं कि उसकी अपनी कहानी भी दर्शकों को आकर्षित कर सकती है।
क्लाइमैक्स छोड़ जाता है अगली कहानी का सवाल
फिल्म का क्लाइमैक्स इसकी खासियतों में शामिल है। पूरी कहानी के दौरान चल रहा सत्ता का खेल आखिर में एक ऐसे मोड़ पर पहुंचता है, जो दर्शकों को आगे की कहानी के बारे में सोचने पर मजबूर करता है।
यही वह जगह है जहां फिल्म खत्म होने के बाद भी मिर्जापुर की दुनिया दिमाग में घूमती रहती है। दर्शक जानते हैं कि इस तरह की कहानी में आगे क्या होने की संभावना है, लेकिन फिर भी अगला कदम देखने की उत्सुकता बनी रहती है।
यही वजह है कि फिल्म के बाद सबसे बड़ा सवाल यही हो सकता है कि क्या Mirzapur The Movie Part 2 भी देखने को मिलेगी?
Mirzapur The Movie Rating: ★★★☆☆ (3/5)
Mirzapur The Movie Cast: पंकज त्रिपाठी, अली फजल, दिव्येंदु, रवि किशन, जितेंद्र कुमार, रसिका दुग्गल, शीबा चड्ढा, अभिषेक बनर्जी, श्रिया पिलगांवकर, श्वेता त्रिपाठी, हरशिता गौर, सोनल चौहान, राजेश तैलंग, सुशांत सिंह, मोहित मलिक और कुलभूषण खरबंदा।
Mirzapur The Movie Director: गुरमीत सिंह
Disclaimer:
यह फिल्म रिव्यू उपलब्ध जानकारी और फिल्म से जुड़े कंटेंट के आधार पर तैयार किया गया है। फिल्म को लेकर दर्शकों की राय अलग-अलग हो सकती है। लेख का उद्देश्य पाठकों को फिल्म की कहानी, कलाकारों के प्रदर्शन और मनोरंजन के स्तर की सामान्य जानकारी देना है।
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