Idhayam Murali Review: मिलेनियल्स का प्यार, Gen-Z वाला मूव ऑन… कहानी में दिल कम, स्टाइल ज्यादा

By: Abhinav kumar

On: Monday, August 17, 2026 10:00 AM

Idhayam Murali Review:
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Idhayam Murali Review:  कभी-कभी कोई फिल्म हमें प्यार की ऐसी कहानी दिखाती है, जिसमें रिश्ते पुराने जमाने जैसे लगते हैं, लेकिन किरदारों का नजरिया बिल्कुल आज की पीढ़ी जैसा होता है। ‘इधयम मुरली’ भी कुछ ऐसी ही कहानी लेकर आती है। फिल्म का नाम 90 के दशक के तमिल सिनेमा के दर्शकों के लिए खास मायने रखता है, क्योंकि इसका कनेक्शन दिवंगत अभिनेता मुरली की यादगार फिल्म ‘इधयम’ से जुड़ा हुआ है। हालांकि नई फिल्म उसी कहानी को दोहराने के बजाय आज के रिश्तों और प्यार को अपने अंदाज में देखने की कोशिश करती है।

फिल्म में मुरली के बेटे अथर्व मुख्य भूमिका में हैं। उनके साथ प्रीति मुकुंदन और कायडू लोहर नजर आती हैं। कहानी में दोस्ती, प्यार, शादी, पुराने रिश्ते और आगे बढ़ जाने की कोशिश जैसे कई पहलू हैं। लेकिन सवाल यही है कि क्या फिल्म इन भावनाओं को दर्शकों के दिल तक पहुंचा पाती है? जवाब थोड़ा मिला-जुला है।

शादी से सिर्फ 24 घंटे पहले शुरू होती है कहानी

कहानी की शुरुआत एक फ्लाइट से होती है। इधया मुरली अपने करीबी दोस्तों के साथ न्यूयॉर्क से भारत लौट रहा है। खास बात यह है कि उसकी शादी होने में सिर्फ 24 घंटे बचे हैं। यानी जिंदगी का एक बड़ा फैसला उसके बिल्कुल सामने खड़ा है।

लेकिन ऐसी स्थिति में भी उसका अतीत उसके साथ सफर कर रहा है। फिल्म धीरे-धीरे उसके पुराने रिश्तों और उन भावनाओं को सामने लाती है, जिन्हें शायद वह पीछे छोड़ने की कोशिश कर चुका है। यही से कहानी दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या इंसान वास्तव में अपने पुराने प्यार से पूरी तरह आगे बढ़ सकता है या कुछ रिश्ते जिंदगी में हमेशा कोई न कोई निशान छोड़ जाते हैं।

मिलेनियल्स का प्यार और Gen-Z वाला मूव ऑन

फिल्म का सबसे दिलचस्प पहलू इसका रिलेशनशिप एंगल है। कहानी में प्यार को सिर्फ एक खूबसूरत एहसास के तौर पर नहीं दिखाया गया, बल्कि यह भी दिखाने की कोशिश की गई है कि अलग-अलग पीढ़ियां रिश्तों को किस तरह देखती हैं।

मिलेनियल्स के लिए प्यार अक्सर लंबे समय तक निभाने, यादों को संभालकर रखने और रिश्ते को दूसरा मौका देने से जुड़ा रहा है। वहीं आज की Gen-Z पीढ़ी के बीच चीजें बदलती दिखाई देती हैं। रिश्ता खत्म हुआ तो आगे बढ़ने की कोशिश, खुद को प्राथमिकता देना और नई शुरुआत करना ज्यादा सामान्य हो गया है।

‘इधयम मुरली’ इन्हीं दोनों सोच के बीच अपने किरदारों को खड़ा करती है। समस्या यह है कि फिल्म इस भावनात्मक संघर्ष को उतनी गहराई से नहीं पकड़ पाती, जितनी इसकी कहानी से उम्मीद होती है।

Idhayam Murali Review:

अथर्व ने निभाया दिल से जुड़ा किरदार

अथर्व के लिए यह फिल्म सिर्फ एक और रोमांटिक कहानी नहीं है। वह दिवंगत अभिनेता मुरली के बेटे हैं और फिल्म का नाम भी उनके पिता की चर्चित फिल्म की याद दिलाता है। ऐसे में उनके किरदार पर दर्शकों की नजर स्वाभाविक रूप से ज्यादा रहती है।

अथर्व अपनी स्क्रीन प्रेजेंस से फिल्म को संभालने की पूरी कोशिश करते हैं। उनके किरदार में प्यार, उलझन और आगे बढ़ने की कोशिश दिखाई देती है। हालांकि कमजोर स्क्रिप्ट कई जगह उनके अभिनय की क्षमता को पूरी तरह सामने नहीं आने देती। प्रीति मुकुंदन और कायडू लोहर भी अपने-अपने किरदारों में ठीक नजर आती हैं। दोनों के किरदार कहानी को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन उन्हें भी ऐसी मजबूत भावनात्मक गहराई नहीं मिलती, जिससे दर्शक पूरी तरह उनसे जुड़ सकें।

Idhayam Murali Review: फहाद फासिल का छोटा लेकिन असरदार अंदाज

फिल्म में फहाद फासिल की मौजूदगी एक अलग आकर्षण पैदा करती है। उनका किरदार बहुत बड़ा या बेहद महत्वपूर्ण नजर नहीं आता, लेकिन उनकी अदाकारी छोटे से रोल में भी अपनी छाप छोड़ती है।

फहाद की खासियत यही है कि वह साधारण दिखने वाले किरदार को भी अपने अभिनय से यादगार बना सकते हैं। इस फिल्म में भी उनकी स्क्रीन प्रेजेंस कई जगह ध्यान खींचती है और कमजोर हिस्सों के बीच वह दर्शकों को बांधे रखने में मदद करते हैं।

थंगा का किरदार दिखाता है भावनाएं दबाने का दर्द

कहानी में इधया के अंकल थंगा का किरदार भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने इधया को पाला-पोसा है, लेकिन खुद अपनी भावनाओं को खुलकर जाहिर करना कभी नहीं सीख पाए।

यह किरदार फिल्म के उस पक्ष को सामने लाता है, जहां प्यार सिर्फ प्रेमी-प्रेमिका के बीच नहीं होता। परिवार, परवरिश और उन भावनाओं की भी अपनी जगह होती है जिन्हें लोग अक्सर शब्दों में कह नहीं पाते। थंगा के जरिए फिल्म यह बताने की कोशिश करती है कि भावनाएं दबाकर रखना भी इंसान की जिंदगी पर गहरा असर डाल सकता है।

कहानी में इमोशन की कमी खलती है

फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसकी स्क्रिप्ट है। कहानी में ऐसे कई मौके आते हैं, जहां दर्शक भावुक हो सकते थे। पुराने प्यार की यादें, शादी से पहले की उलझन और रिश्तों के बीच चुनाव जैसे विषय अपने आप में काफी भावनात्मक हैं।

लेकिन फिल्म इन पलों को पूरी ताकत के साथ इस्तेमाल नहीं कर पाती। नतीजा यह होता है कि दर्शक किरदारों की स्थिति समझ तो लेता है, लेकिन उनके दर्द को पूरी तरह महसूस नहीं कर पाता।

फिल्म को एक्टर्स की स्क्रीन प्रेजेंस से काफी सहारा मिलता है, लेकिन सिर्फ अच्छे कलाकार किसी कमजोर कहानी की कमी को पूरी तरह दूर नहीं कर सकते।

Disclaimer:

यह रिव्यू उपलब्ध जानकारी और फिल्म से जुड़े विवरणों के आधार पर लिखा गया है। फिल्म को लेकर दर्शकों की पसंद और राय अलग-अलग हो सकती है।

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Abhinav kumar

मेरा नाम अभिनव है और मैं Daily Sutra के लिए लेखन करता हूँ। मुझे टेक्नोलॉजी, ऑटोमोबाइल, ई-स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट और लेटेस्ट न्यूज़ जैसे विषयों पर आर्टिकल लिखने का अनुभव है। मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि जानकारी आसान, स्पष्ट और भरोसेमंद भाषा में प्रस्तुत करूँ, ताकि हर पाठक उसे आसानी से समझ सके। मेरा फोकस पाठकों तक सही और उपयोगी जानकारी पहुँचाने पर रहता है। डिजिटल मीडिया के लिए तथ्यात्मक और यूज़र-फ्रेंडली कंटेंट लिखना मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।
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